Essay On Problems Of N Farmers

Essay On Problems Of N Farmers-76
जैन-ग्रन्थ: जैन साहित्य को ‘आगम’ (सिद्धान्त) कहा जाता है । जैन साहित्य का दृष्टिकोण भी बौद्ध साहित्य के समान ही धर्मपरक है । जैन ग्रन्थों में परिशिष्टपर्वन, भद्रबाहुचरित, आवश्यकसूत्र, आचारांगसूत्र, भगवतीसूत्र, कालिकापुराण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है । इनसे अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की सूचना मिलती है ।जैन धर्म का प्रारम्भिक इतिहास ”कल्पसूत्र” (लगभग चौथी शती ई॰ पू॰) से ज्ञात होता है जिसकी रचना भद्रबाहु ने की थी । परिशिष्टपर्वन् तथा भद्रबाहुचरित से चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की प्रारम्भिक तथा उत्तरकालीन घटनाओं की सूचना मिलती है । भगवतीसूत्र में महावीर के जीवन, कृत्यों तथा अन्य समकालिकों के साथ उनके सम्बन्धों का बड़ा ही रोचक विवरण मिलता है ।आचारांगसूत्र जैन भिक्षुओं के आचार-नियमों का वर्णन करता है । जैन साहित्य में पुराणों का भी महत्वपूर्ण स्थान है जिन्हें ‘चरित’ भी कहा जाता है । ये प्राकृत, संस्कृत तथा अपभ्रंश, तीनों भाषाओं में लिखे गये है । इनमें पद्‌मपुराण, हरिवंशपुराण, इत्यादि उल्लेखनीय है ।जैन पुराणों का समय छठी शताब्दी से सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक निर्धारित किया गया । यद्यपि इनमें मुख्यत: कथायें दी गयी है तथापि इनके अध्ययन से विभिन्न काली की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दशा का थोड़ा बहुत ज्ञान प्राप्त हो जाता है ।III.

Tags: Can You Copyright An EssayDiscrimination On Race EssayI Need Help Writing A EssayMla Essay With Multiple AuthorsEssay Evaluative WordsPleasantville Character EssayCritical Thinking Definition For Nursing

नार्डिक ।भाषाविदों ने उपयुक्त प्रजातियों को चार भाषा समूहों के अन्तर्गत समाहित किया है: 1. मेडीटरेनियन (भूमध्य-सागरीय): इस प्रजाति की तीन शाखायें भारत में आई तथा अन्तर्विवाह के फलस्वरूप परस्पर घुल-मिल गयीं । मिश्रित रूप से उनके वंशज बड़ी संख्या में भारत में विद्यमान हैं । इनकी एक शाखा कन्नड, तमिल, मलयालम भाषा-भाषी प्रदेश में, दूसरी पंजाब तथा गंगा की ऊपरी घाटी में तथा तीसरी सिन्ध, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाये जाते हैं ।सामान्यत: भूमध्यसागरीय प्रजाति का सम्बन्ध द्रविड़ जाति से बताया जाता है । इसके अस्थि-पञ्जर सैन्धव सभ्यता में भी मिलते हैं । ये लम्बे सिर, मध्यम कद, चौड़े मुँह, पतले होंठ, घुँघराले बाल, भूरी त्वचा वाले होते है । इनकी प्रमुख देन है-नौ परिवहन, कृषि एवं व्यापार-वाणिज्य, नागर सभ्यता का सूत्रपात आदि ।कुछ विद्वान् द्रविडों को ही सैन्धव सभ्यता का निर्माता मानते है किन्तु यह संदिग्ध है । भाषाविदों का विचार है कि भारत में भारोपीय भाषा में जो परिवर्तन दिखाई देता है वह भूमध्यसागरीय अथवा द्रविड़ सम्पर्क का ही परिणाम था ।e.

मंगोलायड: ये छोटी नाक, मोटे होंठ, लम्बे-चौड़े सिर, पीले अथवा भूरे चेहरे वाले होते थे । इस जनजाति में पूर्व की ओर से भारत में प्रवेश किया । इस प्रजाति के तत्व मीरी, नागा, बोडो, गोंड, भोटिया तथा बंगाल-असम की जातियों में मिलते है । इनकी भाषा चीनी-तिब्बती समूह की भाषा से मिलती है ।संभवत: मंगोल जाति के प्रभाव से ही भारतीय संस्कृति में तंत्र, वामाचार, शक्ति-पूजा एवं कुछ अश्लील धार्मिक कृत्यों का आविर्भाव हुआ । मोहेनजोदड़ो की कुछ छोटी-छोटी मृण्मूर्तियों तथा कपालों में इस जाति के शारीरिक लक्षण दिखाई देते है ।d.

भारतीय इतिहास पर निबंध | Essay on Indian History in Hindi language! ए स्मिथ जैसे विद्वानों ने भी किया है । 11वीं शती के मुस्लिम लेखक अल्वरूनी इससे मिलता-जुलता विचार व्यक्त करते हुए लिखता है- हिन्दू लोग घटनाओं के ऐतिहासिक कम की ओर बहुत अधिक ध्यान नहीं देते । घटनाओं के तिथिक्रमानुसार वर्णन करने में वे बड़ी लापरवाही बरतते है ।किन्तु भारतीयों के इतिहास विषयक गान पर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा लगाया गया उपरोक्त आरोप सत्य से परे है । वास्तविकता यह है कि प्राचीन भारतीयों ने इतिहास को उस दृष्टि से नहीं देखा जिससे कि आज के विद्वान् देखते है । उनका दृष्टिकोण पूर्णतया धर्मपरक था ।उनकी दृष्टि में इतिहास साम्राज्यों अथवा सम्राटों के उत्थान अथवा पतन की गाथा न होकर उन समस्त मूल्यों का संकलन-मात्र था जिनके ऊपर मानव-जीवन आधारित है । अतः उनकी बुद्धि धार्मिक और दार्शनिक ग्रन्थों की रचना में ही अधिक लगी, न कि राजनैतिक घटनाओं के अंकन में ।तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्राचीन भारतीयों में ऐतिहासिक चेतना का भी अभाव था । प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययन से यह वात स्पष्ट हो जाती है कि यहाँ के निवासियों में अति प्राचीन काल से ही इतिहास-बुद्धि विद्यमान रही । वैदिक साहित्य, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में अत्यन्त सावधानीपूर्वक सुरक्षित आचार्यों की सूची (वंश) से यह बात स्पष्ट हो जाती है ।वंश के अतिरिक्त गाथा तथा नाराशंसी साहित्य, जो राजाओं तथा ऋषियों के स्तुतिपरक गीत है, से भी सूचित होता है कि वैदिक युग में इतिहास लेखन की परम्परा विद्यमान थी । इसके अतिरिक्त ‘इतिहास तथा पुराण’ नाम से भी अनेक रचनायें प्रचलित थी । इन्हें ‘पंचम वेद’ कहा गया है ।सातवीं शती के चीनी यात्री हुएनसांग ने लिखा है कि भारत के प्रत्येक प्रान्त में घटनाओं का विवरण लिखने के लिये कर्मचारी नियुक्त किये गये थे । कल्हण के विवरण से पता चलता है कि प्राचीन भारतीय विलुप्त तथा विस्मृत इतिहास को पुनरुज्जीवित करने की कुछ आधुनिक विधियों से भी परिचित थे ।वह लिखता हैं- “वही गुणवान् कवि प्रशंसा का अधिकारी है जो राग-द्वेष से मुक्त होकर एकमात्र तथ्यों के निरूपण में ही अपनी भाषा का प्रयोग करता है ।” वह हमें बताता है कि इतिहासकार का धर्म मात्र ज्ञात घटनाओं में नई घटनाओं को जोड़ना नहीं होता । अपितु सच्चा इतिहासकार प्राचीन अभिलेखों तथा सिक्कों का अध्ययन करके विलुप्त शासकों तथा उनकी विजयों की पुन: खोज करता है ।कल्हण का यह कथन भारतीयों में इतिहास-बुद्धि का सबल प्रमाण प्रस्तुत करता है । इस प्रकार यदि हम सावधानीपूर्वक अपने विशाल साहित्य की छानबीन करें तो उसमें हमें अपने इतिहास के पुनर्निर्माणार्थ अनेक महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होगी ।साहित्यिक ग्रन्थों के साथ-साथ भारत में समय-सभय पर विदेशों से आने वाले यात्रियों के भ्रमण-वृत्तान्त भी इतिहास-विषयक अनेक उपयोगी सामग्रियों प्रदान करते है । इधर पुरातत्ववेत्ताओं ने अतीत के खण्डहरों से अनेक ऐसी वस्तुएँ खोज निकाली हैं जो हमें प्राचीन इतिहास-सम्बन्धी बहुमूल्य प्रदान करती हैं ।अत: हम सुविधा के लिये भारतीय इतिहास जानने के साधनों को तीन शीर्षकों में रख सकते हैं: (1) साहित्यिक साक्ष्य ।(2) विदेशी यात्रियों के विवरण ।(3) पुरातत्व-सम्बन्धी साक्ष्य ।यहाँ हम प्रत्येक का अलग-अलग विवेचन करेंगे: (1) साहित्यिक साक्ष्य:इस साक्ष्य के अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक सामग्रियों का अध्ययन किया जाता है ।हमारा साहित्य दो प्रकार का हैं: (a) धार्मिक साहित्य,(b) लौकिक साहित्य ।धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेतर ग्रन्थों की चर्चा की जा सकती है । ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण तथा स्मृति ग्रन्थ आते है, जबकि बाह्मणेतर गुणों में बौद्ध तथा जैन साहित्यों से सम्बन्धित रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है । इसी प्रकार लौकिक साहित्य में ऐतिहासिक ग्रंथों, जीवनियां, कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है ।इनका अलग-अलग विवरण इस प्रकार है: I. वेद: वेद भारत के सर्वप्राचीन धर्म ग्रन्थ है जिनका संकलनकर्त्ता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है । भारतीय परम्परा वेदों को नित्य तथा अपौरुषेय मानती है। वैदिक युग की सांस्कृतिक दशा के ज्ञान का एकमात्र सोत होने के कारण वेदों का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है । प्राचीन काल के अध्ययन के लिये रोचक समस्त सामग्री हमें प्रचुर रूप में वेदों से उपलब्ध हो जाती है ।वेदों की संख्या चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद । इनमें ऋग्वेद न केवल भारतीय आयी की अपितु समस्त आर्य जाति की प्राचीनतम् रचना । इस प्रकार यह भारत तथा भारतेतर प्रदेशों के आर्यों के इतिहास, भाषा, धर्म एवं उनकी सामान्य संस्कृति पर प्रकाश डालता है । विद्वानों के अनुसार आयी ने इसकी रचना पंजाब में किया था जब वे अफगानिस्तान से लेकर गंगा-यमुना के प्रदेश तक ही फैले थे । इनमें दस मण्डल तथा 1028 सूक्त है ।ऋग्वेद का अधिकांश भाग देव-स्तोत्रों में भरा हुआ है और इस प्रकार उसमें ठोस ऐतिहासिक सामग्री बहुत कम मिलती है । परन्तु इसके कुछ मन्त्र ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करते है । जैसे, एक स्थान पर “दस राजाओं के युद्ध” (दाशराज्ञ) का वर्णन आया है जो भरत कबीले के राजा सुदास के साथ हुआ था । यह ऋग्वैदिक काल की एकमात्र महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है ।यह युद्ध आयी के दो प्रमुख जनों- पुरु तथा भरत के बीच हुआ था । भरत जन का नेता सुदास था जिसके पुरोहित वशिष्ठ थे । इनके विरुद्ध दस राजाओं का एक सध था जिसके पुरोहित विश्वामित्र थे । सुदास ने रावी नदी के तट पर दस राजाओं के इस संघ को परास्त किया और इस प्रकार वह ऋग्वैदिक भारत का चक्रवर्ती शासक बन बैठा ।सामवेद तथा यजुर्वेद में किसी भी विशिष्ट ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं मिलता । ‘साम’ का शाब्दिक अर्थ है गान । इसमें मुख्यत: यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले मन्त्रों का संग्रह है । इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है । यजुर्वेद में यज्ञों के नियमों एवं विधि-विधानों का संकलन मिलता है ।जबकि अन्य वेद पद्य में हैं, यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है । ऐतिहासिक दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व रस बात में है कि रस में सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अंधविश्वासों का विवरण मिलता है । इनमें कुल 731 मन्त्र तथा लगभग 6000 पद्य हैं । इसके कुछ मन्त्र ऋग्वैदिक मन्त्रों से भी प्राचीनतर है ।पृथिवीसूक्त इसका प्रतिनिधि सूक्त माना जाता है । इसमें मानव जीवन के सभी पक्षों-गृह निर्माण, कृषि की उन्नति, व्यापारिक मार्गों का गाहन, रोग निवारण, समन्वय, विवाह तथा प्रणय-गीतों, राजभक्ति, राजा का चुनाव, बहुत सी वनस्पतियों तथा औषधियों आदि का विवरण दिया गया है ।कुछ मन्त्रों में जादू-टोने का भी वर्णन है जो इस बात का सूचक है कि इस समय तक आर्य- अनार्य संस्कृतियों का समन्दय हो रहा था तथा आयी ने अनायों के कई सामाजिक एवं धार्मिक रीति रिवाजों एवं विश्वासों को ग्रहण कर लिया था । अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा कहा गया है तथा कुरु देश की समृद्धि का अच्छा चित्रण मिलता है । इन चार वेदों को “संहिता” कहा जाता है ।ii.

हिमालय पर्वत के दक्षिण तथा हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित एशिया महाद्वीप का विशाल प्रायद्वीप भारत कहा जाता है । इसका विस्तृत भूखण्ड, जिसे एक उपमहाद्वीप कहा जाता है, आकार में विषम चतुर्भुज जैसा है ।यह लगभग 2500 मील लम्बा तथा 2000 मील चौड़ा है । रूस को छोड़कर विस्तार में यह समस्त यूरोप के बराबर है । यूनानियों ने इस देश को इण्डिया कहा है तथा मध्यकालीन लेखकों ने इस देश को हिन्द अथवा हिन्दुस्तान के नाम से सम्बोधित किया है ।भौगोलिक दृष्टि से इसके चार विभाग किये जा सकते हैं: (i) उत्तर का पर्वतीय प्रदेश: यह तराई के दलदल वनों से लेकर हिमालय की चोटी तक विस्तृत है जिसमें कश्मीर, काँगड़ा, टेहरी, कुमायूँ तथा सिक्किम के प्रदेश सम्मिलित हैं ।(ii) गंगा तथा सिन्धु का उत्तरी मैदान: इस प्रदेश में सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियाँ, सिन्ध तथा राजस्थान के रेगिस्तानी भाग तथा गंगा और यमुना द्वारा सिंचित प्रदेश सम्मिलित हैं । देश का यह भाग सर्वाधिक उपजाऊ है । यहाँ आर्य संस्कृति का विकास हुआ । इसे ही ‘आर्यावर्त’ कहा गया है ।(iii) दक्षिण का पठार: इस प्रदेश के अर्न्तगत उत्तर में नर्मदा तथा दक्षिण में कृष्णा और तुड्गभद्रा के बीच का भूभाग आता है ।(iv) सुदूर दक्षिण के मैदान: इसमें दक्षिण के लम्बे एवं संकीर्ण समुद्री क्षेत्र सम्मिलित हैं । इस भाग में गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के उपजाऊ डेल्टा वाले प्रदेश आते हैं । दक्षिण का पठार तथा सुदूर दक्षिण का प्रदेश मिलकर आधुनिक दक्षिण भारत का निर्माण करते हैं । नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ, विन्धय तथा सतपुड़ा पहाड़ियों और महाकान्तार के वन मिलकर उत्तर भारत को दक्षिण भारत से पृथक् करते हैं ।इस पृथकता के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत आर्य संस्कृति के प्रभाव से मुक्त रहा, जबकि उत्तर भारत में आर्य संस्कृति का विकास हुआ । दक्षिण भारत में एक सर्वथा भिन्न संस्कृति विकसित हुई जिसे ‘द्रविण’ कहा जाता है । इस संस्कृति के अवशेष आज भी दक्षिण में विद्यमान हैं ।प्रकृति ने भारत को एक विशिष्ट भौगोलिक इकाई प्रदान की है । उत्तर में हिमालय पर्वत एक ऊंची दीवार के समान इसकी रक्षा करता रहा है तथा हिन्द महासागर इस देश को पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण से घेरे हुए हैं । इन प्राकृतिक सीमाओं द्वारा बाह्य आक्रमणों से अधिकांशत: सुरक्षित रहने के कारण भारत देश अपनी एक सर्वथा स्वतन्त्र तथा पृथक् सभ्यता का निर्माण कर सका है ।भारतीय इतिहास पर यहाँ के भूगोल का गहरा प्रभाव-पड़ा है । यहां के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग कहानी है । एक ओर ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं तो दूसरी ओर नीचे के मैदान हैं, एक ओर अत्यन्त उपजाऊ प्रदेश है तो दूसरी ओर विशाल रेगिस्तान है । यहाँ उभरे पठार, घने वन तथा एकान्त घाटियाँ हैं । एक ही साथ कुछ स्थान अत्यन्त उष्ण तथा कुछ अत्यन्त शीतल है ।विभिन्न भौगोलिक उप-विभागों के कारण यहाँ प्राकृतिक एवं सामाजिक स्तर की विभिन्नतायें दृष्टिगोचर होती हैं । ऐसी विषमता यूरोप में कहीं भी दिखायी नहीं देती हैं । भारत का प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र एक विशिष्ट इकाई के रूप में विकसित हुआ है तथा उसने सदियों तक अपनी विशिष्टता बनाये रखी है ।इस विशिष्टता के लिये प्रजातीय तथा भाषागत तत्व भी उत्तरदायी रहे हैं । फलस्वरूप सम्पूर्ण देश में राजनैतिक एकता की स्थापना करना कभी भी सम्भव नहीं हो सका है, यद्यपि अनेक समय में इसके लिये महान शासकों द्वारा प्रयास किया जाता रहा है । भारत का इतिहास एक प्रकार से केन्द्रीकरण तथा विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों के बीच निरन्तर संघर्ष की कहानी है ।देश की विशालता तथा विश्व के शेष भागों से इसकी पृथकता ने अनेक महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न किये है । भारत के अपने आप में एक विशिष्ट भौगोलिक इकाई होने के कारण भारतीय शासकों तथा सेनानायकों ने देश के बाहर साम्राज्य विस्तृत करने अथवा अपनी सैनिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार भारत में ही किया ।सुदूर दक्षिण के चोलों का उदाहरण इस विषय में एक अपवाद माना जा सकता है । अति प्राचीन समय से यहाँ भिन्न-भिन्न जाति, भाषा, धर्म, वेष-भूषा तथा आचार-विचार के लोग निवास करते हैं । किसी भी बाहरी पर्यवेक्षक को यहाँ की विभिन्नतायें खटक सकती हैं ।परन्तु इन वाह्य विभिन्नताओं के मध्य एकता दिखाई देती है जिसकी कोई भी उपेक्षा नहीं कर सकता । फलस्वरूप ‘विभिन्नता में एकता’ (Unity in Diversity) भारतीय संस्कृति की सर्वप्रमुख विशेषता बन गयी है । देश की समान प्राकृतिक सीमाओं ने यहाँ के निवासियों के मस्तिष्क में समान मातृभूमि की भावना जागृत किया है । मौलिक एकता का विचार यहाँ सदैव बना रहा तथा इसने देश के राजनैतिक आदर्शों को प्रभावित किया ।यद्यपि व्यवहार में राजनैतिक एकता बहुत कम स्थापित हुई तथापि राजनैतिक सिद्धान्त के रूप में इसे इतिहास के प्रत्येक युग में देखा जा सकता है । सांस्कृतिक एकता अधिक सुस्पष्ट रही है । भाषा, साहित्य, सामाजिक तथा धार्मिक आदर्श इस एकता के प्रमुख माध्यम रहे हैं । भारतीय इतिहास के अति-प्राचीन काल से ही हमें इस मौलिक एकता के दर्शन होते हैं ।महाकाव्य तथा पुराणों में इस सम्पूर्ण देश को ‘भारतवर्ष’ अर्थात् भारत का देश तथा यहाँ के निवासियों को ‘भारती’ (भरत की सन्तान) कहा गया है । विष्णुपुराण में स्पष्टत: इस एकता की अभिव्यक्ति हुई है- “समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो स्थित है वह भारत देश है तवा वहाँ की सन्तानें ‘भारती’ हैं ।”प्राचीन कवियों, लेखकों तथा विचारकों के मस्तिष्क में एकता की यह भावना सदियों पूर्व से ही विद्यमान रही है । कौटिल्यीय अर्थशास्त्र में कहा गया है कि-“हिमालय में लेकर समुद्र तक हजार योजन विस्तार वाला भाग चक्रवर्ती राजा का शासन क्षेत्र होता है ।” यह सर्वभौम सम्राट की अवधारणा भारतीय सम्राटों को अत्यन्त प्राचीन काल से ही प्रेरणा देती रही है ।भारतीयों की प्राचीन धार्मिक भावनाओं एवं विश्वासों से भी इस सारभूत एकता का परिचय मिलता है । यहाँ की सात-पवित्र नदियाँ- गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी, सात पर्वत- महेन्द्र, मलय, सह्या, शक्तिमान, ऋक्ष्य, विन्ध्य तथा पारियात्र तथा सात नगरियों- अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्ति, पुरी तथा द्वारावती, देश के विभिन्न भागों में बसी हुई होने पर भी देश के सभी निवासियों के लिये समान रूप से श्रद्धेय रही हैं ।वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों का सर्वत्र सम्मान है तथा शिव और विष्णु आदि देवता सर्वत्र पूजे जाते है।, यद्यपि यहीं अनेक भाषायें है तथापि वे सभी संस्कृत से ही उद्भूत अथवा प्रभावित है । धर्मशास्त्रों द्वारा प्रतिपादित सामाजिक व्यवस्था भी सर्वत्र एक ही समान है । वर्णाश्रम, पुरुषार्थ आदि सभी समाजों के आदर्श रहे है ।प्राचीन समय में जबकि आवागमन के साधनों का अभाव था, पर्यटक, धर्मोपदेशक, तीर्थयात्री, विद्यार्थी आदि इस एकता को स्थापित करने में सहयोग प्रदान करते रहे है । राजसूय, अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठान द्वारा चक्रवर्ती पद के आकांक्षी सम्राटों ने सदैव इस भावना को व्यक्त किया है कि भारत का विशाल भूखण्ड एक है । इस प्रकार विभिन्नता के बीच सारभूत एकता भारतीय संस्कृति की सर्वप्रमुख विशेषता बनी हुई है ।आदि काल से ही भारत में विभिन्न जातियाँ निवास करती थीं जिनकी भाषाओं, रहन-सहन, सामाजिक-धार्मिक परम्पराओं में भारी विषमता थीं । भारत में नृजातीय तत्वों की पहचान प्रधानत: भौतिक, भाषाई तथा सांस्कृतिक लक्षणों पर आधारित है । नृतत्व विज्ञान मानव की शारीरिक बनावट के आधार पर उसकी प्रजाति का निर्धारण करता है ।इसके दो प्रधान मानक है: i. नासिका सम्बन्धीहमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि प्राचीन जनजाति में लम्बे तथा चौड़े दोनों ही सिरों वाले लोग विद्यमान थे जैसा कि प्राचीन कंकालों एवं कपालों से इंगित होता है । भारत में प्रागैतिहासिक मानवों के प्रस्तरित अवशेष अत्यल्प है किन्तु नृतत्व एवं भाषा विज्ञान की सहायता से यहाँ रहने अथवा आव्रजित होने चाली प्रजातियों तथा भारतीय संस्कृति के विकास में उनके योगदान का अनुमान लगाया गया है । बी॰ एस॰ ने प्रागैतिहासिक अस्थिपंजरों का अध्ययन करने के उपरान्त यहाँ की आदिम जातियों को छ भागों में विभाजित किया है ।a. ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद: संहिता के पश्चात् ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों का स्थान है । इनसे उत्तर वैदिक कालीन समाज तथा संस्कृति के विषय में अच्छा ज्ञान प्राप्त होता है । ब्राह्मण ग्रन्थ वैदिक संहिताओं की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गये हैं । प्रत्येक संहिता के लिये अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ हैं जैसे- ऋग्वेद के लिये ऐतरेय तथा कौषीतकी, यजुर्वेद के लिये तैत्तिरीय तथा शतपथ, सामवेद के लिये पंचविश, अथर्ववेद के लिये गोपथ आदि ।इन ग्रन्थों से हमें परीक्षित के बाद और बिम्बिसार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है । ऐतरेय, शतपथ, तैत्तिरीय, पंचविश आदि प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों में अनेक ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं । ऐतरेय में राज्याभिषेक के नियम तथा कुछ प्राचीन अभिषिक्त राजाओं के नाम दिये गये है ।शतपथ में गन्धार, शल्य, कैकय, कुरु, पंचाल, कोसल, विदेह आदि के राजाओं का उल्लेख मिलता है । प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है । कर्मकाण्डों के अतिरिक्त इसमें सामाजिक विषयों का भी वर्णन है । इसी प्रकार आरण्यक तथा उपनिषदों में भी कुछ ऐतिहासिक-तेल प्राप्त होते हैं, यद्यपि ये मुख्यत: दार्शनिक ग्रन्थ है जिनका ध्येय ज्ञान की खोज करना है । इनमें हम भारतीय चिंतन की चरम परिणति पाते हैं ।iii.

These problems spurred the creation of the Populist Party, whose goals were to bring redemption to the agricultural community.

First off, the most severe problem being battled by the farmers was that of falling crop prices.It enabled them to bind together as an organized group, express their grievances, and gain a sense of belonging to the community they had previously lacked.In conclusion, the farmers of the late 19th century faced many legitimate problems. Introduction The problems facing the farmer of the late 19th Century were very broad.They ranged from falling crop prices, to unfair treatment by the railroads, and also the fight to have silver coined as money, in effort to increase the value of a dollar.With this came the discontent of many farmers, as they wanted unlimited coinage of silver to battle the falling crop prices and increase the amount of money in circulation.Another problem that contributed to the shortage of money in the nation was the monopolies in the late 19th century.यूनानी-रोमन (क्लासिकल) लेखक: यूनान के प्राचीनतम लेखकों में टेसियस तधा हेरोडोटस के नाम प्रसिद्ध है । टेसियस ईरान का राजवैद्य था तथा उसने ईरानी अधिकारियों द्वारा ही भारत के विषय में जानकारी प्राप्त की थी । परन्तु उसका विवरण आश्चर्यजनक कहानियों से परिपूर्ण होने के कारण अविश्वसनीय हो गया है । हेरोडोटस को ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है ।उसने अपनी पुस्तक ‘हिस्टोरिका (Historica) में पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत-फारस के सम्बन्ध का वर्णन किया है । उसका विवरण अधिकांशत अनुभूतियों तथा अफवाहों पर आधारित है । सिकन्दर के साथ आने वाले लेखकों में नियार्कस, आनेसिक्रिटस तथा आरिस्टोबुलस के विवरण अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं । चूँकि रन लेखकों का उद्देश्य अपनी रचनाओं द्वारा अपने देशवासियों को भारतीयों के विषय में बताना था, अत: इनका वृत्तान्त यथार्थ है ।सिकन्दर के पश्चात् के लेखकों में तीन राजदूतों-मेगस्थनीज डाइमेकस तथा डायीनिसियस के नाम उल्लेखनीय है जो यूनानी शासकों द्वारा पाटलिपुत्र के मौर्य दरवार में भेजे गये थे । इनमें भी मेगस्थनीज सर्वाधिक प्रसिद्ध है । वह सेल्युकस ‘निकेटर’ का राजदूत था तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था । उसने ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक में मौर्ययुगीन समाज एवं संस्कृति के विषय में लिखा है ।यद्यपि यह पुस्तक अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है तथापि इसके कुछ अंश उद्धरण के रूप में एरियन, स्ट्रेबी, जस्टिन आदि लेखकों की कृतियों में प्राप्त होते है । ‘इण्डिका’ वस्तुतः यूनानियों द्वारा भारत के सम्बन्ध दे शप्त शनराशि में सबसे अमूल्य रत्न है ।डाइमेकस (सीरियन नरेश अन्तियोकस का राजदूत) बिन्दुसार के दरबार में तथा डायोनिसियल (मिस्र नरेश टालमी फिलेडेल्फस का राजदूत) अशोक के दरबार दे आया था । अन्य अन्यों में ‘पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रयन-सी’, टालमी का भूगोल, प्लिनी का ‘नेचुरल हिन्दी’ आदि का भी उल्लेख किया जा सकता है । पेरीप्लस का लेखक 80 ई.के लगभग हिन्द महासागर की यात्रा पर आया था ।उसने उसके बन्दरगाहों तथा व्यापारिक वस्तुओं का विवरण दिया है । प्राचीन भारत के समुद्री व्यापार के ज्ञान के लिये उसका विवरण बड़ा उपयोगी है । दूसरी शताब्दी ईस्वी में टालमी ने भारत का भूगोल लिखा था । प्लिनी का ग्रन्थ प्रथम शताब्दी ईस्वी का है । इससे भारतीय पशुओं, पेड़-पौधों, खनिज पदार्थों आदि का ज्ञान प्राप्त होता है ।II.चीनी-लेखक: प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में चीनी यात्रियों के विवरण भी विशेष उपयोगी रहे हैं। ये चीनी यात्री बौद्ध मतानुयायी थे तथा भारत में बौद्ध तीर्थस्थानों की यात्रा तथा बौद्ध धर्म के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिये आये थे। वे भारत का उल्लेख ‘यिन्-तु’ (Yin-tu) नाम से करते हैं ।इनमें चार के नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं- फाहियान, सुंगपुन, हुएनसांग तथा इत्सिग । फाहियान, गुप्तनरेश चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (375-415 ई.) के दरबार में आया था । उसने अपने विवरण में मध्यदेश के समाज एवं संस्कृति का वर्णन किया है । वह मध्यदेश की जनता को चुखी एवं समृद्ध बताता है ।सुंगयुन 518 ई.में भारत में आया और उसने अपने तीन वर्ष की यात्रा में बौद्ध ग्रन्धों की प्रतियाँ एकत्रित कीं । चीनी यात्रियों में सवाधिक महत्व हुएनसाग अथवा युवानच्चाग का ही है जो महाराज हर्षवर्द्धन के शासन काल में (629 ई.

SHOW COMMENTS

Comments Essay On Problems Of N Farmers

  • Words Short Essay on an Indian Farmer - World’s Largest.
    Reply

    Words Short Essay on an Indian Farmer. the days of plugging the fields with the help of oxen are almost over except or the farmers who are too poor to.…

  • What are the problems faced by Indian farmers in. - Quora
    Reply

    Many problems were faced by the farmers,but here I mention some of the important ones. * They do not know the dosage of the fertilizers,pesticides,etc.due to which they use them indiscriminately thinking that they will have good yield,if they use.…

  • What are the biggest problems faced by farmers in. - Quora
    Reply

    Oh no.please. Indian farmers don’t need any more technology now. Their problem rather unique & one of a kind. Before we jump to conclusions, let us try to.…

  • Indian Agriculture Problems 7 Major Problems of Indian.
    Reply

    The following points will highlight the seven major problems of Indian agriculture. Problem # 1. Instability Agriculture in India is largely depends on monsoon. As a result, production of food-grains fluctuates year after year. A year of abun­dant output of cereals is often followed by a year of acute shortage.…

  • Short Essay on Life of a Farmer - Important India
    Reply

    Life of a Farmer – Short Essay 2. Farmers are the most hardworking people. Growing crops and plants is their real desire. Life of a farmer. Farmers live a simple life.; They are used to working on a sunny day and while it is raining.…

  • Essay on Organic Farming Bartleby
    Reply

    The Effects Of Organic Farming On The Environment 1678 Words 7 Pages. and prodigious amounts of fossil fuel and water usage. Organic farming is a way to combat these detrimental environmental effects, by avoiding chemical fertilizers and herbicides and taking advantage of biodynamic farming, not only are healthier products be grown, but the environment will be nurtured as well.…

  • Log into Your Farmers Account
    Reply

    You can use your Farmers account to manage your insurance policies and pay your bills online.…

  • A Big Drought In Texas - 809 Words Bartleby
    Reply

    Problems by Farmers and Immigrants in 1800's 861 Words 4 Pages. ending silver would lower farm prices. The Bland-Allison Act was a help for farmers, calling for the government to coin more silver, increase the money supply, and cause inflation. Lastly, natural disasters played a big role for farmers.…

  • Essay on Indian Farmers in Hindi -
    Reply

    ADVERTISEMENTS भारतीय किसान पर निबंध Essay on Indian Farmers in Hindi! भारत गांवों का देश है । भारत की आत्मा गांवों और किसानों में बसती है । इसलिए भारत एक कृषि प्रधान देश भी कहलता है.…

  • Major Agricultural Problems of India and their Possible.
    Reply

    Major Agricultural Problems of India and their Possible Solutions. these farmers are forced, under socio-economic conditions, to carry on distress sale of.…

The Latest from strahuemvseh.ru ©